Wednesday, 18 April 2018

गर होते...













पंछी होते तो पंख होते
तितली होते तो रंग होते,

चूम लेते आसमां सारा,
बन हवा बादल के संग होते।

बन के बूंद गिरते दरख्तों पर,
पत्तियों की उमंग होते,

घुल जाते समां में,
जो वीणा की तरंग होते

छा जाते, लहरा जाते,
जो खूबसूरत तिरंग होते।

पर इंसां हैं,जमीं पर हैं,
अंबर है बहुत दूर,

है शुक्रिया खुदा
आसमां में दर ओ खिड़कियां नहीं,

क्या ख़ाक देखते,
जो इनके दरवाज़े भी बंद होते।।

प्रियंका सिंह

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