Friday, 16 July 2021

माचिस से घर









माचिस से घर
हम तीली से,
कभी जल जाते
कभी सीले से।

धूप को तरसे
और बारिश को,
बंद घरों में
तरसे आँगन को।

ए. सी. कमरों में
पीपल को सोचें,
सावन के झूले
हवा के झोंके।

काश छत पर चढ़
बारिश में नहाते,
ठहरे पानी में
कागज़ी नाव चलाते।

कैसे कर लें
माचिस से घर में,
अपने मन की
ये सारी बातें।

काश कि कोई
उपहार स्वरूप,
मुट्ठी में लाए
थोड़ी सी धूप।

अंजुली में भर
बारिश भी लाए,
थोड़ी नीम की
छांह ले आये।

साथ ले आए
वो अल्हड़पन भी,
वो बेफिक्री और
बचपन का मन भी।

~ प्रियंका सिंह

आप इस कविता का वीडियो मेरे यूट्यूब चैनल काव्यांजलि। Kavyanjali पर भी देख सकते हैं. 



Tuesday, 29 June 2021

पिघलते साये


 





साथ जो साये बन चलते रहे,
पड़ी धूप तो गुपचुप पिघलते रहे,
बन के कालिख़ लगे कभी हम पर,
कभी ग़ुबार बन हमें निगलते रहे।

जेब में खंज़र लिए,
और हाथ में मरहम लिए,
बन के मेरे हमनवा,
वो साथ ही चलते रहे।

बने रहे रफीक जो,
दरअसल थे हरीफ वो,
मुँह चाशनी करते रहे,
पीठ छलनी करते रहे।

रुसवा ज़माने भर में कर,
वो फिर यूँ नादां बन गए,
तिफ़्ल-ए-दिल दिखते रहे,
आस्तीन के सांप से पलते रहे।

वफा के बदले हमें मौत दी,
अजीज़ बन वो मय्यत में रहे,
सब पुर-अश्क दुआएँ पढ़ते रहे,
वो सना खंज़र रख चलते रहे।

साथ जो साये बन चलते रहे,
पड़ी धूप तो गुपचुप पिघलते रहे,
बन के कालिख़ लगे कभी हम पर,
कभी ग़ुबार बन हमें निगलते रहे।

~ प्रियंका सिंह

हमनवा- दोस्त
रफीक- दोस्त
हरीफ- दुश्मन
रुसवा - अपमानित
तिफ़्ल-ए-दिल- बच्चे जैसा दिल
पुर-अश्क- आंसुओं से भरी हुई आंख

Saturday, 29 May 2021

वर्क फ्रोम होम










वर्क फ्रोम होम
बड़ा कष्टकारी है
लाइलाज बीमारी है।
सुबह आठ से
रात के दस तक,
एक छोटे से
कोने में दफ्तर।
कुर्सी से भैया
ब्याह हो गया,
अब तो साल
सवा हो गया।
ना कहीं
जाने देती,
ना किसी को
पास आने देती।
सुबह से मीटिंग,
कांफ्रेंस, काॅल
बस, बुरा
हो गया हाल।
चौदह घंटे
काम लेते हैं,
तनख्वाह आठ घंटे
की देते हैं।
ऊपर से
टार्गेट का प्रेशर,
डांट ऐसे पड़े
जैसे कोई फ्रेशर।
इन्क्रिमेंट की तो
बात मत करो,
आपको, आपकी
नजरों में गिरा देंगे,
साल भर के काम को
कूड़ा बता देंगे।
अरे! कंपनी की
बैंड बजी पडी है,
आपको इन्क्रिमेंट
की पडी है!

क्या क्लर्क, क्या अफसर, क्या टीचर
सबका यही हाल है,
मजबूरी है साहब
पापी पेट का सवाल है।
टीचर जो बच्चों का
भविष्य बना रहे हैं,
वर्क फ्रोम होम में
सज़ा पा रहे हैं।
सुबह शाम आँनलाइन
पढ़ा रहे हैं,
इग्ज़ाम ले रहे हैं,
वर्कशाँप करा रहे हैं,
दोगुना काम कर
आधी तनख्वाह पा रहे हैं।
क्या ग़ज़ब
बेईमानी हो रही है
वर्क फ्रोम होम के नाम पर
मनमानी हो रही है।

यही है आपदा में अवसर
निकाल दो कर्मचारी का कचूमर,
बना दो उसे बंधुआ मजदूर
बता दो कोरोना का क़ुसूर।
मगर खामोश! जो आवाज उठाई,
यहां बर्दाश्त नहीं सच्चाई।
आधी तनख्वाह
तो पा रहे हो,
देश का भविष्य
बना रहे हो।
पैसा तो
हाथ का मैल है,
आज नहीं तो
कल मिल जाएगा।
वर्क फ्रोम होम
का लुत्फ उठाओ,
ये मौका बार-बार
नहीं आएगा।
वर्क फ्रोम होम!
वाह!

~ प्रियंका सिंह 

Sunday, 16 May 2021

ये मंजर




वक़्त की पेशानी पर ये मंज़र लिखा जाएगा
ना भूलना इसे वर्ना ये वक़्त लौट आएगा

दर्द का ये मंज़र देखा जाता नहीं
दूर तलक उजियारा नज़र आता नहीं

मौत को किस ने यूँ खुला छोड़ा है
वक़्त साँसों के पास थोड़ा है

भरे श्मशान कब्रिस्तान, कतार लाशों की
गंगा माँ भी है रोती देख अंबार लाशों के

हर रोज़ दम तोड़ती है इंसानियत
चारों तरफ पसरी हुई हैवानियत

लाशों पर भी इंसान कारोबार कर रहा
ज्यों किसी की लाश पर गिद्ध पल रहा

तख़्त पर जो ये हुक्मरान बैठे हैं
शायद खुद को ये खुदा मान बैठे हैं

जिंदगियों से ज्यादा सियासत की पड़ी है
भूले हैं यही तो इम्तेहान की घड़ी है

कुछ भी भुलाएँ ना ये मौतें भूल पाएंगे
इतिहास में ये ख़ूनी पन्ने किए दर्ज जाएंगे

वक़्त की पेशानी पर ये मंज़र लिखा जाएगा
ना भूलना इसे वर्ना ये वक़्त लौट आएगा

- प्रियंका सिंह

Thursday, 22 April 2021

धरा का प्रतिकार








धरा लेती है प्रतिकार

हर बार
मांगती है मानव से
उसके अपराधों का हिसाब
जो किए मानव ने
प्रकृति की गोद में बैठ
उसके ही साथ
भूल गया मानव
वो है एक यात्री यहां
जो स्वयं इस धरती का
स्वामी बना
मनुष्य के इसी कृत्य का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

छीनकर किसी और के
हिस्से की धरती
बना ली मनुष्य ने
अपनी संपत्ति
काट डाले पेड़ और
जंगलों में लगाई आग
मार डाले सब जीव
और उजाड़ दिए
उनके घर और नीड़
जो बेज़ुबान नहीं बोलते
कौन करेगा उनकी बात
अपनी उस सन्तान का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

जो नीर कलकल बहता
नदियों में, सागर में
छिपा धरती के नीचे
और बादल में
क्या उस पर हक है
सिर्फ तेरा मेरा ही
छीन कर सब के हिस्से का जल
पी गया सिर्फ मानव ही
सूखा दिये सारे जलाशय
और प्रदूषित किये
झील, सागर, नदी
अपने सूखते जल का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

शहर की नींव में
पहाड़ों को कर दिया दफन
क्षत-विक्षत किए
मनुष्य ने अक्षुण्ण पर्वत
कर के भूधर का खनन
बनाई इमारतें और रास्ते
त्रस्त किया जल जीवन
विकास के वास्ते
टूटे ग्लेशियर, हुआ भूस्खलन
त्राहिमाम हुआ मानव
पर ना कर पाया आत्ममंथन
अपने टूटते पर्वतों का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

प्रियंका सिंह
 

Saturday, 3 April 2021

टेसू


यही था वो मौसम जब तुम गये थे,

यूं ही रास्तों में टेसू बिखरे हुए थे,

शाख़ों पर कुछ पत्ते पुराने कुछ नए थे,

जो टूटे, संग आँधियों के उड़ गए थे।


यही था वो रास्ता जहां आख़िरी मिले थे,

यहीं से तुम किसी मंज़िल को चले थे,

ना मकसद पता, ना कोई वादा किए थे,

टूटे ख़्वाब, आंखों में आब दे गए थे।


यही था वो मंज़र, तमन्नाएं यही थीं,

वो बदलते मौसम की हवाएँ यही थीं,

टीस बन बिखरे टेसू आंख सुर्ख़ कर गए थे,

आती गर्मी में रिश्तों को बर्फ़ कर गए थे।


कभी जो लौटो, तो इसी मौसम में आना,

हो सके तो लेना वो रास्ता पुराना,

बरस-दर-बरस जो तुम्हारी याद दिलाते,

तोहफ़े में वो कुछ बिखरे टेसू ले आना।


~प्रियंका सिंह


टेसू- पलाश के फूल

मकसद- उद्देश्य

आब- पानी

मंज़र- नज़ारा

तमन्नाएं- इच्छायें

टीस- दर्द

सुर्ख़- लाल

बरस-दर-बरस- हर वर्ष

Monday, 23 September 2019

तन्हाई

                      








दिल तन्हा, दिन तन्हा, रात और तन्हा,
सफ़र तन्हा, ये चुप तन्हा, बात और तन्हा ।

तन्हाई का आलम है कुछ इस क़दर,
जुदाई है तन्हा, मुलाक़ात और तन्हा ।


ख़ामोश हर इंसान शोरगुल में दबा,
मौत है तन्हा, हयात और तन्हा ।


ख़ाली हाथ आऐं, ख़ाली ही जाऐं,
ज़िंदगी में सैंकड़ों सौग़़ात और तन्हा ।


तेरे रंज-ओ-ग़म में वो शामिल नहीं,
तेरा ग़म तन्हा, फरहत और तन्हा ।


सिर्फ गुफ़्तगू के कोई मायने नहीं,
हैं महफिल भरी, ख़यालात और तन्हा ।


हज़ारों ख़्वाहिशें हैं दिल में दबीं,
सिर्फ रिश्ते नये, जज़़्बात और तन्हा ।


दामन में उसके सितारे भी नहीं,
है चांद तन्हा, रात और तन्हा ।


दिल तन्हा, दिन तन्हा, रात और तन्हा,
सफर तन्हा, ये चुप तन्हा, बात और तन्हा ।


प्रियंका सिंह


*हयात- जिंदगी
 रंज-ओ-गम- दुख
 फरहत- खुशियां
 गुफ़्तगू- बातचीत