Tuesday, 18 April 2023

काश




 



काश कि जानां मिले ही ना होते, 
सहरा में यूं गुल खिले ही ना होते।

तुम अनजान होते, हम अनजान होते,
चले मोहब्बत के सिलसिले ही ना होते।

ना कदम यूँ बढ़ाते, ना मिलते-मिलाते,
ये इश्क, ये शिकवे-गिले ही ना होते।

इक दिल ही तो था जो अपना था,
तुम दिल ले के यूं चले ही ना होते।

मोहब्बत में सब कुछ भुलाने की चाहत,
ये दिल की लगी के चोंचले ही ना होते।

अमर प्रेम पहले कहानी थी लगती,
गर प्रेम दीप दिल मे जले ही ना होते।

काश कि जानां मिले ही ना होते,
हम-तुम जानां मिले ही ना होते।

~ प्रियंका सिंह 

Friday, 24 February 2023

रात की कविता

एक नन्हीं कविता
रात दबे पाँव 
आई मेरे सिरहाने
धीरे से बोली कान में
आओ मुझे संवार दो
मुझे पृष्ठ पर उतार दो

मैं हल्की उनींदी
हटाती रही उसे 
जा री ओ नन्हीं
नींद आने को है
कल सुबह आना
तू भी सो जा ना

देर तलक
हाथ पकड़ वो
बैठी रही वहीं
मेरा माथा सहला
चुंबन गाल पर टिका
कब गई नहीं पता

सुबह वो लौटी नहीं 
उजाले में खो गई
शायद आये आज रात
चाँदनी रथ पर बैठ
परियों की तरह
अब ना जाने दूंगी
ओ नन्ही कविता...

~प्रियंका सिंह 


Thursday, 13 October 2022

विश्वास

 








मुझे पसंद हैं करवा चौथ पर 

सजी-धजी स्त्रियां 

चटख साड़ी, बिंदी, मेहंदी, चूड़ियों 

के साथ उनकी खनकती हंसी 

और प्रेम भरी आंखें 

साथ ही उनका अटल विश्वास 

कि वो सक्षम हैं 

शायद ईश्वर से भी ज़्यादा। 


सुबह से रात तक भूखी-प्यासी 

वो नहीं दिखतीं विचलित 

वो जानती हैं कि 

इस भूख-प्यास को 

वो यूँ ही हरा देंगी 

जैसे हरा देती हैं 

असंख्य व्रतों में भूख को 

जैसे हरा ही देती हैं 

अपने इर्द-गिर्द बने दायरों को

कटाक्षों को, आक्षेपों को 

और जीत ही जाती हैं 

अपनी हिम्मत और विश्वास से। 


मैं कैसे तौलूं उन्हें 

पितृसत्ता या विश्वास 

के तराजू पर 

मेरा तौल कभी 

सही होगा ही नहीं 

क्यूंकि मेरे पास 

नहीं है वो बाट जो 

तौल दे प्रेम और विश्वास। 


सदा मज़बूत रहना स्त्रियों 

तुम ईश्वर से जीतने 

का विश्वास रखती हो 

संसार तो जीत ही लोगी 

उड़ लो अपनी उड़ान 

जीत लो हर जंग जो

अब तक कठिन लगती थी 

क्यूंकि मुश्किलें

विश्वास से बड़ी नहीं होती। 


~ प्रियंका सिंह 

Friday, 23 September 2022

कुछ बे-हया औरतें








कुछ बे-हया औरतें
उतरी हैं सड़क पर
अपना चेहरा दिखातीं,
जल्दी ढको उन्हें
कि दिख ना जाए
उनका दर्द और उदासी

कुछ बे-हया औरतें
नहीं रहना चाहती
फूल सी नाजुक,
तोड़ डालो उन्हें 
कि बदल न जाएं
वो शोलों में

कुछ बे-हया औरतें
बोलने लगी हैं,
दबा दो ये आवाज़
इस से पहले कि
इनकी चीखें
कानों को चीर जाएं

कुछ बे-हया औरतें
मांगती हैं अपना हक
वो जीना चाहती हैं,
कुचल दो उन्हें
कि साँस लेने का हक
है सिर्फ मर्द को

कुछ बे-हया औरतें
बनना चाहती हैं इंसान,
मार डालो उन्हें
इस से पहले कि
वो बन जाएं
जानवर से इंसान

~ प्रियंका सिंह

Thursday, 1 September 2022

चिट्ठी के ज़माने








वो दौर पुराने थे
चिट्ठी के ज़माने थे,
रंगीन कागज़ों पर
ढेरों अफ़साने थे,
मोहर लगी टिकटें
पते जाने-पहचाने थे,
प्रेम, गिले-शिकवे
सब दिल खोल बताने थे।

कुछ ख़तों में इक ख़त का
इंतज़ार भी होता था,
तहों के बीच फूल रख
इज़हार भी होता था,
जज़्बातों के सैलाबों का
मल्हार भी होता था,
बारिश में धुले हर्फ़ों पर भी
एतबार होता था।

वो चिट्ठी के ज़माने सी
बातें अब क्या होंगी,
वो इन्तज़ार के दिन
और रातें अब क्या होंगी,
प्रियतम के ख़त से बड़ी
सौगातें क्या होंगी,
इक पन्ने में सब कहने की
चाहतें क्या होंगी।

मीलों का सफ़र तय कर
दिल तक आ जाती थीं,
पल-पल की ख़बर ना मिले
पर सच्चा हाल बताती थीं,
वक़्त पर न सही पर
सही पते पर पहुंच ही जाती थीं,
डिलीट नहीं होती थीं
सहेज कर रखी जाती थीं।

हमें मोबाइल के दौर में भी
इक अदद चिट्ठी का इंतज़ार है,
जो गुज़र गया बरसों पहले
उस चिठ्ठी के ज़माने से प्यार है।

~ प्रियंका सिंह

Wednesday, 6 July 2022

ख़त

 





उस ऊंची पहाड़ी पर  

बादलों के बीच घिर 

चमकीली पोटली से निकाल 

एक बार फिर पढ़े 

कुछ बरसों पुराने ख़त,

कहीं-कहीं गिरी थीं 

कुछ बूंदे आंसुओं की 

स्याही मिटी नहीं थी अभी 

खुशबू भी बरकरार थी

लेकिन उम्मीद नहीं। 


मीलों फैले पहाड़ 

छू-छू कर जाते बादल 

नीले आसमान के तले 

उन्हें पढ़ा कई-कई बार,

फिर एक आख़िरी बार 

जोर से सीने से लगा  

बहती हवाओं के साथ 

उन्हें रिहा कर दिया

साथ ही रिहा कर दिये 

यादों के अनगिनत जुगनू। 


दूर तलक उड़ते वो ख़त 

ज्यूं साँझ होते ही 

घरों को लौटते पंछी 

या तेज़ हवाओं में 

शाख़ों से टूटते पत्ते, 

आँखों से ओझल होते 

ख़्वाब, ख्वाहिशें, प्रेम 

जो छूट जाएं तो 

कभी लौटते नहीं। 


उनकी खुशबू अब 

घुल गई फ़िज़ाओं में 

उनके हर्फ़ मिल गए 

बादलों की स्याही में,

हवाओं के संग 

इठलाते उन ख़तों ने 

छुए होंगे कई पेड़ 

मिले होंगे पत्तों संग

बहे होंगे किसी 

झरने की धार में,

धुल तो गई होगी 

अब उनकी स्याही

उनकी खुशबू में 

अब मिल गई होगी 

ओस की खुशबू 

और चीड़ के पेड़ों की। 


बरसों पोटली में बंद 

वो ख़त मेरी तरह 

आज छुए उन्होंने भी 

आकाश, पहाड़, पेड़, नदी 

आज उनका और मेरा 

नया जन्म हुआ

कभी प्रकृति के संग 

लिखे गये ख़त 

आज फिर से 

मिल गए प्रकृति में। 


~ प्रियंका सिंह

Monday, 30 May 2022

भय का खूँटा





रस्मों, रीति- रिवाजों के

बंधनों में बंधी स्त्री,

पहले छटपटाती फिर

स्वयं उनमें बंध जाती,

कब उनके मोह में पड़ जाती

थाह भी ना पाती।

 

सोलह सोमवार से शुरू

उत्तम वर की चाह,

करवा चौथ के

कठिन व्रत में बदलती,

आस्था के नाम पर हर वर्ष

प्रेम की अग्निपरीक्षा देती।

वो भूखी निर्जल देह,

चमकती साड़ी और मेकअप तले

अपमान को दबा,

प्रेम और सम्मान को तरसती

सखियों संग दमकती

अगली सुबह से

फिर पिटती और खटती।

 

सपूत हो या कुपूत

अहोई- जितिया तो होगा ही,

उसके जन्म के बाद से ही

पुत्र-प्रेम की परीक्षा भी

स्त्री ही तो देगी,

जैसे जन्म देना परीक्षा नहीं।

पुत्र कलह करे या मारे,

तो भी अहोई तो होगा

या सात समंदर पार से

बात भी ना कर पाएगा,

व्रत के रूप में

माँ की प्रेम-परीक्षा पाएगा।

 

स्त्रियाँ बंधी हैं व्रतों से

रीति-रिवाजों से,

ज्यूं बंधी हो

खूंटे से कोई गाय,

शिक्षा भी इस खूंटे को

तोड़ नहीं पाए।

 

कई नाम दिए इस खूंटे को,

प्रेम, आस्था, संस्कृति, रिवाज

पर असल नाम भय है।

जिसे बचपन से

स्त्री मन में रोपा जाता है

एक बीज की तरह,

सींचा जाता है ताउम्र

एक पौधे की तरह,

और विवाहोपरांत

पेड़ बनने दिया जाता है

गहरी जड़ों वाला

जिसकी विशाल टहनियों पर टंगते

बिछुए, मंगलसूत्र, बिंदी, चूड़ियां,

और रस्मों रिवाजों की

एक बड़ी सी काली गठरी।

 

चाह कर भी स्त्री

भय के खूंटे से छूटती नहीं

क्यूंकि भय ने ही तो

उसे तराशा है

उम्र के हर पड़ाव पर

भय ने उसे उसकी

हद बताई है

एक लड़की की तरह

पत्नी और बहू की तरह

फिर माँ की तरह

 

स्त्री को कब भय का

खूँटा तोड़ने दिया?

जो भय का खूंटा तोड़ दे

तो स्त्री, स्त्री ना रहेगी

पुरुष ही ना हो जाएगी!


~ 
प्रियंका सिंह
 

Monday, 21 March 2022

कविता का जन्म

 







कविता जन्म लेती है
मन की बंजर ज़मीन पर,
नेह का अमृत पड़े
या अश्रु विषाद के,
दोनों ही सींच जाते
मन की धरती को।

फूटती है जैसे कोपल
जैसे जन्म शिशु का,
कविता के रचयिता का
वो मातृ सुख,
कुछ पीड़ा से भरा,
कुछ उल्लास से परिपूर्ण।

मन देखता कविता को
जन्मते, बढ़ते, लहलहाते,
वो ज़मीन अब बंजर नहीं
कविता ने नरमा दी मिट्टी,
उगने लगी हैं नई कोपलें
कुछ और कविताओं की।


~ प्रियंका सिंह



Wednesday, 29 December 2021

दिसंबर







ज्यों ज्यों ख़त्म हो रहा
हो रहा कमाल दिसंबर,
दिल्ली के सर्द मौसम का
जलवा-ओ-जमाल दिसंबर

सर्द हवा में रुख़सार
और सुर्ख़ हुए जाएं,
बिखरा नर्म गालों पर
बन गुलाल दिसंबर

मौसम तो मोहब्बत में
रास आते हैं सभी,
मुख्तलिफ़ है सर्द शामों 
में विसाल दिसंबर

रिश्तों को गर्म रखती
चाहत की कांगड़ी,
अंगार प्रेम के दहकें
करे बेहाल दिसंबर

गुज़रते साल के शिकवे
दामन में सहेजे,
लाता है आते साल का 
उजाल दिसंबर।

~ प्रियंका सिंह

जलवा - रोशनी, शोभा
जमाल- सौन्दर्य
रुख़सार- गाल
सुर्ख़- लाल
मुख्तलिफ़- अलग
विसाल- मिलन
शिकवे- शिकायत
उजाल - रौशनी 


Saturday, 18 December 2021

वो प्रेम











वो तुमसे किया जो प्रेम था,

किसी और से फिर किया ही नहीं


तन दिया, जीवन दिया पर
मन तो किसी को दिया ही नहीं

तुम जब चाहे स्वप्न में आ जाते,
किसी और को ये हक दिया ही नहीं

हर बार दुखाया दिल तुमने,
कभी कोई गिला किया ही नहीं

जहाँ छोड़ गये इक ज़ख्म तुम,
वो दिल का चाक सिया ही नहीं

वो चाक भी महके चंदन सा,
तेरी खुशबू को रुखसत किया ही नहीं

वो तुमसे किया जो प्रेम था,
किसी और से फिर किया ही नहीं।

~ प्रियंका सिंह 

Friday, 26 November 2021

शहर की चीत्कार

 











नहीं थी गाँव में पक्की सड़क
बड़े स्कूल, कॉलेज, फैक्ट्री या दफ्तर,
लेकिन जीवनयापन को चाहिए
शिक्षा का हथियार, रोज़गार।

आ गए शहर क्यूंकि
पक्की सड़कें ले जाती थीं
कॉलेज और यूनिवर्सिटी की राह,
पाए दफ्तरों में ओहदे
शिक्षा के बल पर,
कैसी भाती थी वो चकाचौंध
रात भर ना सोता शहर, ना तुम,
धीरे-धीरे परिवार आया फिर
गाँव के गाँव और कस्बे
शहर के हो लिए।

शहर ने सबको अपनाया
बिना किसी भेदभाव,
यहां जाति से नहीं
शिक्षा से होती पहचान,
मेहनत कर वो सब पाना चाहा
जो गाँव ना दे सका,
वो सब लिया भी
जो शहर का था।

शहर ने दिया अपना वितान
पंख फैलाने को पूरा आसमान,
क्या ना मिला शहर से
शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी
चमचमाती कार, मकान, दोस्त, पैसा,
बरसों शहर में रह कर
अब कोसते हो शहर को ही,
रूमानी अंदाज़ में बता कर
गाँव के किस्से कहानियां,
ज्यूं शहर में आकर
कुछ भाया ही नहीं
कुछ पाया ही नहीं।

क्यूँ बार-बार बिजली जाती है ?
क्यूँ पानी इतना गंदा है यहां?
देखो, इनकी नदी कितनी मैली है!
क्यूँ मकानों के दाम आसमान छूते हैं?
क्यूँ कालेजों में दाखिला नहीं होता?
अरे, कितना प्रदूषण है यहां!
कैसे जहरीली हवा में साँस लें?
उफ्फ, कितना ट्रैफिक है!
ये शहर तो रहने लायक नहीं रहा!
इस से अच्छा तो गाँव ही था!

जानते हो, अहसान-फरामोश दिखते हो
जब ऐसे कहते हो,
बरसों शहरों का दोहन कर
शहरों को ही कोसते हो,
न्यौते नहीं गए थे
खुद शहर आए थे,
अपनी पहचान बनाने
रोज़गार के लिए।

ये शहर जो आज ज़हर लगते हैं
जिनसे वापस गाँव लौटना चाहते हो,
जाने से पहले इनका उधार चुका जाओ,
वो हवा जिसे प्रदूषित किया तुमने भी,
वो पक्की सड़कें जिनके गड्ढों में
तुम्हारे वाहन का भी योगदान है,
वो बिजली, पानी, ज़मीन,
जिसकी कमी के तुम भी जिम्मेदार हो,
यूँ ही नहीं दोहन कर चलते बनोगे
कर जाओ उसे वैसा ही
जैसा मिला था बरसों पहले,
कम से कम आभार ही जता दो
कि इन शहरों ने बरसों पाला है तुम्हें,
क्या सुनती नहीं तुम्हें शहर की चीत्कार
जिसके तुम भी हो ज़िम्मेदार।

~ प्रियंका सिंह 

Saturday, 28 August 2021

म्यूजिकल चेयर









वैक्सीनेशन सेंटर पर लोगों की
सांप सी लहराती कतार,
कभी कछुआ तो कभी
खरगोश सी चाल चलती।
कतार से निकल कर,
कुछ लोग आ कर
बैठ जाते हैं कुर्सियों पर
जो लगी हैं,
सर्पाकार भीड़ के सामने
एक सीधी लाइन में ।

कभी-कभी खरगोश हो जाती
कतार से कदम मिलाने को,
कुछ महान जन
तुरंत उठ कर खड़े होते,
मिनट भर कतार में रह,
आगे की कुर्सियों को
निशाना बनाते,
ज़रा सी देर उन पर बैठ
फिर कतार में लग जाते,
काफी देर तक ये
उठने और बैठने
का खेल चलता रहा,
पीछे खड़े हम सोचें
ये लोग क्या 
लुत्फ उठा रहे हैं,
वैक्सीनेशन सेंटर पर
'म्यूजिकल चेयर' के गेम सा
मज़ा पा रहे हैं!

बांके जवान भी सब
कुर्सी पर निशाना साधे हैं,
एक खाली होते ही
दो लपकते हैं,
कुर्सी चीज़ ही ऐसी है
छोड़ी भी तो नहीं जाती,
मिल जाये तो
लत लग जाती है,
अब तो यूँ भी खड़े रहने में
बड़ा कष्ट होता है,
डेढ़ साल से घर बैठे हैं
कैसे यकायक खड़े हो पाएंगे,
और इन्तज़ार में कुछ तो करना है
तो 'म्यूजिकल चेयर' ही खेल लें,
वैक्सीन के इंतज़ार में
थोड़ा खेला का रस ले लें, 
हमने भी रस पा लिया
कुर्सी का खेल देखने का 
और कविता करने का।

~ प्रियंका सिंह 

Friday, 16 July 2021

माचिस से घर









माचिस से घर
हम तीली से,
कभी जल जाते
कभी सीले से।

धूप को तरसे
और बारिश को,
बंद घरों में
तरसे आँगन को।

ए. सी. कमरों में
पीपल को सोचें,
सावन के झूले
हवा के झोंके।

काश छत पर चढ़
बारिश में नहाते,
ठहरे पानी में
कागज़ी नाव चलाते।

कैसे कर लें
माचिस से घर में,
अपने मन की
ये सारी बातें।

काश कि कोई
उपहार स्वरूप,
मुट्ठी में लाए
थोड़ी सी धूप।

अंजुली में भर
बारिश भी लाए,
थोड़ी नीम की
छांह ले आये।

साथ ले आए
वो अल्हड़पन भी,
वो बेफिक्री और
बचपन का मन भी।

~ प्रियंका सिंह

आप इस कविता का वीडियो मेरे यूट्यूब चैनल काव्यांजलि। Kavyanjali पर भी देख सकते हैं. 



Tuesday, 29 June 2021

पिघलते साये


 





साथ जो साये बन चलते रहे,
पड़ी धूप तो गुपचुप पिघलते रहे,
बन के कालिख़ लगे कभी हम पर,
कभी ग़ुबार बन हमें निगलते रहे।

जेब में खंज़र लिए,
और हाथ में मरहम लिए,
बन के मेरे हमनवा,
वो साथ ही चलते रहे।

बने रहे रफीक जो,
दरअसल थे हरीफ वो,
मुँह चाशनी करते रहे,
पीठ छलनी करते रहे।

रुसवा ज़माने भर में कर,
वो फिर यूँ नादां बन गए,
तिफ़्ल-ए-दिल दिखते रहे,
आस्तीन के सांप से पलते रहे।

वफा के बदले हमें मौत दी,
अजीज़ बन वो मय्यत में रहे,
सब पुर-अश्क दुआएँ पढ़ते रहे,
वो सना खंज़र रख चलते रहे।

साथ जो साये बन चलते रहे,
पड़ी धूप तो गुपचुप पिघलते रहे,
बन के कालिख़ लगे कभी हम पर,
कभी ग़ुबार बन हमें निगलते रहे।

~ प्रियंका सिंह

हमनवा- दोस्त
रफीक- दोस्त
हरीफ- दुश्मन
रुसवा - अपमानित
तिफ़्ल-ए-दिल- बच्चे जैसा दिल
पुर-अश्क- आंसुओं से भरी हुई आंख

Saturday, 29 May 2021

वर्क फ्रोम होम










वर्क फ्रोम होम
बड़ा कष्टकारी है
लाइलाज बीमारी है।
सुबह आठ से
रात के दस तक,
एक छोटे से
कोने में दफ्तर।
कुर्सी से भैया
ब्याह हो गया,
अब तो साल
सवा हो गया।
ना कहीं
जाने देती,
ना किसी को
पास आने देती।
सुबह से मीटिंग,
कांफ्रेंस, काॅल
बस, बुरा
हो गया हाल।
चौदह घंटे
काम लेते हैं,
तनख्वाह आठ घंटे
की देते हैं।
ऊपर से
टार्गेट का प्रेशर,
डांट ऐसे पड़े
जैसे कोई फ्रेशर।
इन्क्रिमेंट की तो
बात मत करो,
आपको, आपकी
नजरों में गिरा देंगे,
साल भर के काम को
कूड़ा बता देंगे।
अरे! कंपनी की
बैंड बजी पडी है,
आपको इन्क्रिमेंट
की पडी है!

क्या क्लर्क, क्या अफसर, क्या टीचर
सबका यही हाल है,
मजबूरी है साहब
पापी पेट का सवाल है।
टीचर जो बच्चों का
भविष्य बना रहे हैं,
वर्क फ्रोम होम में
सज़ा पा रहे हैं।
सुबह शाम आँनलाइन
पढ़ा रहे हैं,
इग्ज़ाम ले रहे हैं,
वर्कशाँप करा रहे हैं,
दोगुना काम कर
आधी तनख्वाह पा रहे हैं।
क्या ग़ज़ब
बेईमानी हो रही है
वर्क फ्रोम होम के नाम पर
मनमानी हो रही है।

यही है आपदा में अवसर
निकाल दो कर्मचारी का कचूमर,
बना दो उसे बंधुआ मजदूर
बता दो कोरोना का क़ुसूर।
मगर खामोश! जो आवाज उठाई,
यहां बर्दाश्त नहीं सच्चाई।
आधी तनख्वाह
तो पा रहे हो,
देश का भविष्य
बना रहे हो।
पैसा तो
हाथ का मैल है,
आज नहीं तो
कल मिल जाएगा।
वर्क फ्रोम होम
का लुत्फ उठाओ,
ये मौका बार-बार
नहीं आएगा।
वर्क फ्रोम होम!
वाह!

~ प्रियंका सिंह 

Sunday, 16 May 2021

ये मंजर




वक़्त की पेशानी पर ये मंज़र लिखा जाएगा
ना भूलना इसे वर्ना ये वक़्त लौट आएगा

दर्द का ये मंज़र देखा जाता नहीं
दूर तलक उजियारा नज़र आता नहीं

मौत को किस ने यूँ खुला छोड़ा है
वक़्त साँसों के पास थोड़ा है

भरे श्मशान कब्रिस्तान, कतार लाशों की
गंगा माँ भी है रोती देख अंबार लाशों के

हर रोज़ दम तोड़ती है इंसानियत
चारों तरफ पसरी हुई हैवानियत

लाशों पर भी इंसान कारोबार कर रहा
ज्यों किसी की लाश पर गिद्ध पल रहा

तख़्त पर जो ये हुक्मरान बैठे हैं
शायद खुद को ये खुदा मान बैठे हैं

जिंदगियों से ज्यादा सियासत की पड़ी है
भूले हैं यही तो इम्तेहान की घड़ी है

कुछ भी भुलाएँ ना ये मौतें भूल पाएंगे
इतिहास में ये ख़ूनी पन्ने किए दर्ज जाएंगे

वक़्त की पेशानी पर ये मंज़र लिखा जाएगा
ना भूलना इसे वर्ना ये वक़्त लौट आएगा

- प्रियंका सिंह

Thursday, 22 April 2021

धरा का प्रतिकार








धरा लेती है प्रतिकार

हर बार
मांगती है मानव से
उसके अपराधों का हिसाब
जो किए मानव ने
प्रकृति की गोद में बैठ
उसके ही साथ
भूल गया मानव
वो है एक यात्री यहां
जो स्वयं इस धरती का
स्वामी बना
मनुष्य के इसी कृत्य का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

छीनकर किसी और के
हिस्से की धरती
बना ली मनुष्य ने
अपनी संपत्ति
काट डाले पेड़ और
जंगलों में लगाई आग
मार डाले सब जीव
और उजाड़ दिए
उनके घर और नीड़
जो बेज़ुबान नहीं बोलते
कौन करेगा उनकी बात
अपनी उस सन्तान का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

जो नीर कलकल बहता
नदियों में, सागर में
छिपा धरती के नीचे
और बादल में
क्या उस पर हक है
सिर्फ तेरा मेरा ही
छीन कर सब के हिस्से का जल
पी गया सिर्फ मानव ही
सूखा दिये सारे जलाशय
और प्रदूषित किये
झील, सागर, नदी
अपने सूखते जल का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

शहर की नींव में
पहाड़ों को कर दिया दफन
क्षत-विक्षत किए
मनुष्य ने अक्षुण्ण पर्वत
कर के भूधर का खनन
बनाई इमारतें और रास्ते
त्रस्त किया जल जीवन
विकास के वास्ते
टूटे ग्लेशियर, हुआ भूस्खलन
त्राहिमाम हुआ मानव
पर ना कर पाया आत्ममंथन
अपने टूटते पर्वतों का
धरा लेती है प्रतिकार
हर बार।

प्रियंका सिंह
 

Saturday, 3 April 2021

टेसू


यही था वो मौसम जब तुम गये थे,

यूं ही रास्तों में टेसू बिखरे हुए थे,

शाख़ों पर कुछ पत्ते पुराने कुछ नए थे,

जो टूटे, संग आँधियों के उड़ गए थे।


यही था वो रास्ता जहां आख़िरी मिले थे,

यहीं से तुम किसी मंज़िल को चले थे,

ना मकसद पता, ना कोई वादा किए थे,

टूटे ख़्वाब, आंखों में आब दे गए थे।


यही था वो मंज़र, तमन्नाएं यही थीं,

वो बदलते मौसम की हवाएँ यही थीं,

टीस बन बिखरे टेसू आंख सुर्ख़ कर गए थे,

आती गर्मी में रिश्तों को बर्फ़ कर गए थे।


कभी जो लौटो, तो इसी मौसम में आना,

हो सके तो लेना वो रास्ता पुराना,

बरस-दर-बरस जो तुम्हारी याद दिलाते,

तोहफ़े में वो कुछ बिखरे टेसू ले आना।


~प्रियंका सिंह


टेसू- पलाश के फूल

मकसद- उद्देश्य

आब- पानी

मंज़र- नज़ारा

तमन्नाएं- इच्छायें

टीस- दर्द

सुर्ख़- लाल

बरस-दर-बरस- हर वर्ष

Monday, 23 September 2019

तन्हाई

                      








दिल तन्हा, दिन तन्हा, रात और तन्हा,
सफ़र तन्हा, ये चुप तन्हा, बात और तन्हा ।

तन्हाई का आलम है कुछ इस क़दर,
जुदाई है तन्हा, मुलाक़ात और तन्हा ।


ख़ामोश हर इंसान शोरगुल में दबा,
मौत है तन्हा, हयात और तन्हा ।


ख़ाली हाथ आऐं, ख़ाली ही जाऐं,
ज़िंदगी में सैंकड़ों सौग़़ात और तन्हा ।


तेरे रंज-ओ-ग़म में वो शामिल नहीं,
तेरा ग़म तन्हा, फरहत और तन्हा ।


सिर्फ गुफ़्तगू के कोई मायने नहीं,
हैं महफिल भरी, ख़यालात और तन्हा ।


हज़ारों ख़्वाहिशें हैं दिल में दबीं,
सिर्फ रिश्ते नये, जज़़्बात और तन्हा ।


दामन में उसके सितारे भी नहीं,
है चांद तन्हा, रात और तन्हा ।


दिल तन्हा, दिन तन्हा, रात और तन्हा,
सफर तन्हा, ये चुप तन्हा, बात और तन्हा ।


प्रियंका सिंह


*हयात- जिंदगी
 रंज-ओ-गम- दुख
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Saturday, 19 January 2019

दरकती दीवार











 


मेरे गांव में एक घर की पुरानी दीवार,
दरकते रिश्तों सी दरकती दीवार,
कुछ ईंटें हैं बिखरी कुछ अब भी हैं चस्पॉं,
कई पुश्तों की कहानी समेटे दीवार,
सुनाते हैं तुमको गर वक्त हो तो,

कुछ कहना चाहे ये बूढ़ी दीवार।

कभी बॉंधे थी खुद में हज़ारों यादें,
ऑंगन में बच्चों के खेल, मॉंओं की बातें,
भैंस का चारा, दूध का दुहना,
सुबह का चूल्हा, दही का मथना,
चारपाई पर लेटी अम्मा की बुड़बुड़

सॉंझ को नीम तले हुक्के की गुड़गुड़।

ठिठोली भी होती, लड़ाई भी होती,
मुंह फुलाए ननद-भौजाई भी होती,
कभी बनती-बिगड़ती, भाइयों में ठनती,
अम्मा की डांट पर मान मनौव्वल भी होती,
खामोश खड़ी थी, पर सब सुनती थी,

वो दीवार जिसकी पुरखों ने नींव रखी थी।

अब सबको जाना शहर था सब पढ़ गये थे,
छोड़ अम्मा-बाबा को सब कढ़ गये थे,
वो ऑंगन था सूना, वो नीम अकेला,
अब कहॉं लगता था बच्चों का मेला,
अम्मा चल बसीं, न बाबा रहे,

वो नीम, वो दीवार वहीं थे खड़े।

हरा नीम सूख कर ठूंठ खड़ा था,
हुई चौखट पुरानी, किवाड़ गिर पड़ा था,
दीवार की ईंटों में काई जमी थी,
धीरे-धीरे वो भी गिर पड़ी थीं,
आवाज़ें सुनने को तरसती बूढ़ी दीवार,

दरकते रिश्तों सी दरकती दीवार।।

प्रियंका सिंह